Shiva Ashtottara Shatanama Stotram in Hindi | संपूर्ण शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् अर्थ सहित

शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: अर्थ, महत्त्व, पाठ विधि एवं 108 दिव्य नामों की व्याख्या

सनातन धर्म में भगवान शिव को देवाधिदेव महादेव, सर्वव्यापी, अव्यक्त, अनन्त और कल्याणकारी माना गया है। शिव पुराण और शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव की प्रसन्नता और कृपा प्राप्त करने के लिए स्तोत्र पाठ, नाम-जप तथा ध्यान को अत्यंत प्रभावशाली माध्यम माना गया है। इनमें से ‘शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्’ (Shiva Ashtottara Shatanama Stotram) का विशेष स्थान है।

यह स्तोत्र भगवान शिव के 108 पवित्र नामों का दिव्य संग्रह है। पुराणों के अनुसार, इन 108 नामों का रहस्य सर्वप्रथम जगत्पालक भगवान श्री हरि विष्णु ने माता पार्वती को उनकी इष्ट सिद्धि और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने हेतु प्रदान किया था। इस विस्तृत आलेख में हम शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ, उसका हिंदी अर्थ, ध्यान मंत्र, 108 नामों की व्याख्या और पाठ की शास्त्रीय विधि पर विस्तार से चर्चा करेंगे।


1. भगवान शिव का ध्यान मंत्र एवं भावार्थ

किसी भी स्तोत्र या मंत्र का पाठ प्रारंभ करने से पूर्व भगवान शिव का ध्यान करना अनिवार्य माना गया है। ध्यान मंत्र द्वारा साधक अपने चित्त को एकाग्र कर महादेव के दिव्य स्वरूप का दर्शन अपने हृदयकमल में करता है।

शान्ताकारं शिखरशयनं नीलकण्ठं सुरेशम्।
विश्वाधारं स्फटिकसदृशं शुभ्रवर्णं शुभाङ्गम्॥
गौरीकान्तं त्रितयनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे शम्भुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

ध्यान मंत्र का विशद हिंदी भावार्थ:

  • शान्ताकारं शिखरशयनं: जिनका विग्रह अत्यंत सौम्य, शांत और आनंदमय है, जो पवित्र कैलास पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर निवास करते हैं।
  • नीलकण्ठं सुरेशम्: जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा हेतु समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया (नीलकंठ) और जो समस्त देवताओं के स्वामी हैं।
  • विश्वाधारं स्फटिकसदृशं: जो इस संपूर्ण चर-अचर जगत् के एकमात्र आधार हैं, जिनका वर्ण निर्मल स्फटिक मणि के समान स्वच्छ और उज्ज्वल है।
  • शुभ्रवर्णं शुभाङ्गम्: जिनका स्वरूप परम पवित्र, निष्कलंक तथा सभी अंगों में परम मंगलकारी ऊर्जा प्रवाहित करने वाला है।
  • गौरीकान्तं त्रितयनयनं: जो जगज्जननी माता गौरी (पार्वती) के प्राणप्रिय पति हैं और जो तीन नेत्रों (सूर्य, चंद्रमा और अग्नि) से युक्त हैं।
  • योगिभिर्ध्यानगम्यम्: जिन्हें कठोर साधना, ध्यान और आत्मज्ञान द्वारा योगियों द्वारा ही हृदय में धारण किया जा सकता है।
  • वन्दे शम्भुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्: मैं उन भगवान शंभु की वंदना करता हूँ, जो जन्म-मरण एवं संसार के समस्त भयों का नाश करने वाले हैं।

2. संपूर्ण शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (मूल संस्कृत पाठ)

शिवो महेश्वरः शम्भुः पिनाकी शशिशेखरः।
वामदेवो विरूपाक्षः कपर्दी नीललोहितः॥ १ ॥

शंकरः शूलपाणिश्च खट्वाङ्गी विष्णुवल्लभः।
शिपिविष्टोऽम्बिकानाथः श्रीकण्ठो भक्तवत्सलः॥ २ ॥

भवः शर्वस्त्रिलोकेशः शितिकण्ठः शिवाप्रियः।
उग्रः कपाली कामारिरन्धकासुरसूदनः॥ ३ ॥

गंगाधरो ललाटाक्षः कालकालः कृपानिधिः।
भीमः परशुहस्तश्च मृगपाणिर्जटाधरः॥ ४ ॥

कैलासवासी कवची कठोरस्त्रिपुरान्तकः।
वृषाङ्को वृषभारूढो भस्मोद्धूलितविग्रहः॥ ५ ॥

सामप्रियः स्वरमयस्त्रयीमूर्तिरनीश्वरः।
सर्वज्ञः परमात्मा च सोमसूर्याग्निलोचनः॥ ६ ॥

हविर्यज्ञमयः सोमः पंचवक्त्रः सदाशिवः।
विश्वेश्वरो वीरभद्रो गणनाथः प्रजापतिः॥ ७ ॥

हिरण्यरेता दुर्धर्षो गिरीशो गिरिशोऽनघः।
भुजंगभूषणो भर्गो गिरिधन्वा गिरिप्रियः॥ ८ ॥

कृत्तिवासा पुरारातिर्भगवान् प्रमथाधिपः।
मृत्युंजयः सूक्ष्मतनुर्जगद्व्यापी जगद्गुरुः॥ ९ ॥

व्योमकेशो महासेनजनकश्चारुविक्रमः।
रुद्रो भूतपतिः स्थाणुरहिर्बुध्न्यो दिगम्बरः॥ १० ॥

अष्टमूर्तिरनेकात्मा सात्त्विकः शुद्धविग्रहः।
शाश्वतः खण्डपरशूरजः पाशविमोचनः॥ ११ ॥

मृडः पशुपतिर्देवो महादेवोऽव्ययो प्रभुः।
पूषदन्तभिदव्यग्रो दक्षाध्वरहरो हरः॥ १२ ॥

भगनेत्रभिदव्यक्तः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्।
अपवर्गप्रदोऽनन्तस्तारकः परमेश्वरः॥ १३ ॥

॥ फलश्रुति ॥
एतदष्टोत्तरशतनाम्नामाम्नायेन सम्मितम्।
विष्णुना कथितं पूर्वं पार्वत्या इष्टसिद्धये॥ १४ ॥

शंकरस्य प्रिया गौरी जपित्वा त्रैकालमन्वहम्।
नोदिता पद्मनाभेन वर्षमेकं प्रयत्नतः॥ १५ ॥

अवाप सा शरीरार्धं प्रसादाच्छूलधारिणः।
यस्त्रिसंध्यं पठेच्छम्भोर्नाम्नामष्टोत्तरं शतम्॥ १६ ॥

शतरुद्रित्रिरावृत्त्या यत्फलं प्राप्यते नरैः।
तत्फलं प्राप्नुयादेतदेकवृत्त्या जपन्नरः॥ १७ ॥

बिल्वपत्रैः प्रशस्तैर्वा पुष्पैश्च तुलसीदलैः।
तिलाक्षतैर्यजेद् यस्तु जीवन्मुक्तो न संशयः॥ १८ ॥

नाम्नामेषां पशुपतेरेकमेवापवर्गदम्।
अन्येषां चावशिष्टानां फलं वक्तुं न शक्यते॥ १९ ॥

॥ इति श्रीशिवरहस्ये गौरीनारायणसंवादे शिवाष्टोत्तरशतदिव्य नामामृतस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


3. स्तोत्र का हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक संदेश

इस दिव्य स्तोत्र में निहित श्लोकों का भावार्थ अत्यधिक गूढ़ है। यह न केवल भगवान शिव की महिमा गाता है, बल्कि उनके विविध अलौकिक रूपों और लीलाओं का बोध भी कराता है:

श्लोक 1 से 3 का भावार्थ: भगवान शिव कल्याणकारी (शिव), परम ईश्वर (महेश्वर) और आनंद प्रदान करने वाले (शंभु) हैं। वे हाथ में पिनाक धनुष धारण करते हैं (पिनाकी) और उनके मस्तक पर बालचंद्र सुशोभित है (शशिशेखर)। वे सुंदर स्वरूप वाले (वामदेव), त्रिनेत्रधारी (विरूपाक्ष), सुंदर जटाओं वाले (कपर्दी) तथा नीले और लाल वर्ण वाले (नीललोहित) हैं। वे शंकर, शूलपाणि, खट्वांगी और भगवान विष्णु के परम प्रिय (विष्णुवल्लभ) हैं।

श्लोक 4 से 6 का भावार्थ: वे गंगा को अपनी जटाओं में धारण करते हैं (गंगाधर), ललाट पर तीसरा नेत्र रखते हैं (ललाटाक्ष), काल के भी काल (कालकाल) और करुणा के महासागर (कृपानिधि) हैं। वे विकराल रूप वाले (भीम), हाथ में परशु धारण करने वाले, हाथ में मृग रखने वाले (मृगपाणि) और कैलाश पर्वत पर निवास करने वाले (कैलासवासी) हैं। वे सामवेद के प्रिय (सामप्रिय), सातों स्वरों में व्याप्त, वेदत्रयी के रूप तथा सर्वज्ञ परमात्मा हैं।

श्लोक 7 से 13 का भावार्थ: भगवान शिव पाँच मुख वाले (पंचवक्त्र), सदा कल्याण करने वाले (सदाशिव), ब्रह्मांड के स्वामी (विश्वेश्वर) और वीरभद्र रूप धारण करने वाले हैं। वे संपूर्ण विश्व में व्याप्त सूक्ष्म स्वरूप (सूक्ष्मतनु), जगद्गुरु, आकाश रूपी केश वाले (व्योमकेश) और कार्तिकेय के पिता (महासेनजनक) हैं। वे पशुपति, महादेव, अव्यय प्रभु, अनंत, हजारों नेत्र व चरणों वाले (सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपात्) और जीवों को मोक्ष प्रदान करने वाले (अपवर्गप्रद) परमेश्वर हैं।


4. भगवान शिव के 108 दिव्य नाम और उनके अर्थ (108 Names of Lord Shiva)

यदि आप स्तोत्र के स्थान पर नाम-जप (अष्टोत्तर शतनामावली) करना चाहते हैं, तो प्रत्येक नाम के आगे ‘ॐ’ और अंत में ‘नमः’ लगाकर जप किया जाता है। नीचे भगवान शिव के सभी 108 नामों की क्रमवार तालिका दी गई है:

क्रमांक नाम (मंत्र) संस्कृत नाम अर्थ एवं आध्यात्मिक महत्त्व
1 ॐ शिवाय नमः शिव जो परम कल्याणकारी और अत्यंत मंगलमय हैं।
2 ॐ महेश्वराय नमः महेश्वर जो समस्त देवताओं और प्रपंच के परम ईश्वर हैं।
3 ॐ शम्भवे नमः शम्भु जो स्वतः आनंद स्वरूप हैं और सुख प्रदान करते हैं।
4 ॐ पिनाकिने नमः पिनाकी जो पिनाक नामक दिव्य धनुष धारण करते हैं।
5 ॐ शशिशेखराय नमः शशिशेखर जो अपने शीश पर चंद्रमा धारण करते हैं।
6 ॐ वामदेवाय नमः वामदेव जो अत्यंत सुंदर और शांत स्वरूप वाले हैं।
7 ॐ विरूपाक्षाय नमः विरूपाक्ष तीन नेत्रों वाले और विलक्षण दृष्टि रखने वाले।
8 ॐ कपर्दिने नमः कपर्दी जो जटाजूट धारण करने वाले हैं।
9 ॐ नीललोहिताय नमः नीललोहित जो नीले और लाल वर्ण के तेजोमय स्वरूप वाले हैं।
10 ॐ शंकराय नमः शंकर जो सभी जीवों का कल्याण करते हैं।
11 ॐ शूलपाणये नमः शूलपाणि जिनके हाथ में त्रिशूल है।
12 ॐ खट्वांगिने नमः खट्वांगी जो खट्वांग नामक अस्त्र धारण करते हैं।
13 ॐ विष्णुवल्लभाय नमः विष्णुवल्लभ जो भगवान श्री हरि विष्णु के अत्यंत प्रिय हैं।
14 ॐ शिपिविष्टाय नमः शिपिविष्ट जो महान प्रकाश किरणों में निवास करते हैं।
15 ॐ अम्बिकानाथाय नमः अम्बिकानाथ जो देवी अम्बिका (पार्वती) के स्वामी हैं।
16 ॐ श्रीकण्ठाय नमः श्रीकण्ठ जिनका कंठ अत्यंत सुंदर और शोभायमान है।
17 ॐ भक्तवत्सलाय नमः भक्तवत्सल जो अपने भक्तों पर अत्यंत स्नेह रखते हैं।
18 ॐ भवाय नमः भव जो संसार के रूप में स्वयं प्रकट होते हैं।
19 ॐ शर्वाय नमः शर्व जो समस्त कष्टों और अज्ञान का नाश करते हैं।
20 ॐ त्रिलोकेशाय नमः त्रिलोकेश जो तीनों लोकों के स्वामी हैं।
21 ॐ शितिकण्ठाय नमः शितिकण्ठ जिनका कंठ विषपान के कारण नीला-सफेद है।
22 ॐ शिवाप्रियाय नमः शिवाप्रिय जो देवी पार्वती के परम प्रिय हैं।
23 ॐ उग्राय नमः उग्र जो दुष्टों के लिए अत्यंत भयानक रूप हैं।
24 ॐ कपालिने नमः कपालि जो कपाल की माला धारण करते हैं।
25 ॐ कामारये नमः कामारि जो कामदेव के शत्रु और वासना विजेता हैं।
26 ॐ अंधकासुरसूदनाय नमः अंधकासुरसूदन अंधकासुर नामक दैत्य का वध करने वाले।
27 ॐ गंगाधराय नमः गंगाधर जटाओं में पतितपावनी गंगा को धारण करने वाले।
28 ॐ ललाटाक्षाय नमः ललाटाक्ष ललाट पर ज्ञान की तीसरी आँख रखने वाले।
29 ॐ कालकालाय नमः कालकाल जो काल (मृत्यु और समय) के भी महाकाल हैं।
30 ॐ कृपानिधये नमः कृपानिधि जो करुणा और दया के महासागर हैं।
31 ॐ भीमाय नमः भीम जो अत्यंत शक्तिशाली और विशाल हैं।
32 ॐ परशुहस्ताय नमः परशुहस्त जो हाथ में फरसा (परशु) धारण करते हैं।
33 ॐ मृगपाणये नमः मृगपाणि जो हाथ में हिरण धारण करते हैं।
34 ॐ जटाधराय नमः जटाधर जो शीश पर विशाल जटाएँ धारण करते हैं।
35 ॐ कैलासवासिने नमः कैलासवासी जो कैलास पर्वत पर निवास करते हैं।
36 ॐ कवचिने नमः कवची जो धर्म रूपी कवच धारण करते हैं।
37 ॐ कठोराय नमः कठोर जो अधर्मियों के लिए अत्यंत कठोर हैं।
38 ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः त्रिपुरान्तक त्रिपुर दैत्यों के तीनों नगरों का नाश करने वाले।
39 ॐ वृषांकाय नमः वृषांक जिनके ध्वज पर नंदी का चिह्न है।
40 ॐ वृषभारूढाय नमः वृषभारूढ जो नंदी बैल की सवारी करते हैं।
41 ॐ भस्मोद्धूलितविग्रहाय नमः भस्मोद्धूलितविग्रह जो संपूर्ण शरीर पर पवित्र भस्म रमाते हैं।
42 ॐ सामप्रियाय नमः सामप्रिय जिन्हें सामवेद का गान प्रिय है।
43 ॐ स्वरमयाय नमः स्वरमय जो संगीत के सातों स्वरों में व्याप्त हैं।
44 ॐ त्रयीमूर्तये नमः त्रयीमूर्ति जो तीन वेदों या त्रिदेव के रूप हैं।
45 ॐ अनीश्वराय नमः अनीश्वर जिनके ऊपर कोई अन्य स्वामी नहीं है।
46 ॐ सर्वज्ञाय नमः सर्वज्ञ जो सब कुछ जानने वाले हैं।
47 ॐ परमात्मने नमः परमात्मा जो समस्त जीवों के भीतर स्थित परम आत्मा हैं।
48 ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः सोमसूर्याग्निलोचन चंद्रमा, सूर्य और अग्नि रूपी नेत्रों वाले।
49 ॐ हविषे नमः हवि जो यज्ञ की पवित्र आहुति स्वरूप हैं।
50 ॐ यज्ञमयाय नमः यज्ञमय जो स्वयं संपूर्ण यज्ञ का स्वरूप हैं।
51 ॐ सोमाय नमः सोम जो चंद्रमा के समान शीतल और आनंदमयी हैं।
52 ॐ पंचवक्त्राय नमः पंचवक्त्र जो पाँच मुखों वाले दिव्य स्वरूप हैं।
53 ॐ सदाशिवाय नमः सदाशिव जो नित्य और सदैव कल्याणप्रद हैं।
54 ॐ विश्वेश्वराय नमः विश्वेश्वर जो संपूर्ण विश्व के स्वामी हैं।
55 ॐ वीरभद्राय नमः वीरभद्र जो पराक्रमी वीरभद्र अवतार रूप हैं।
56 ॐ गणनाथाय नमः गणनाथ जो शिवगणों के स्वामी हैं।
57 ॐ प्रजापतये नमः प्रजापति जो समस्त प्रजा के रक्षक हैं।
58 ॐ हिरण्यरेतसे नमः हिरण्यरेता जो प्रचंड तेजोमय स्वरूप वाले हैं।
59 ॐ दुर्धर्षाय नमः दुर्धर्ष जिन्हें कोई वश में या पराजित नहीं कर सकता।
60 ॐ गिरीशाय नमः गिरीश जो पर्वतों (कैलास) के स्वामी हैं।
61 ॐ गिरिशाय नमः गिरिश जो पर्वत पर शयन करते हैं।
62 ॐ अनघाय नमः अनघ जो पापों से पूरी तरह रहित और निष्कलंक हैं।
63 ॐ भुजंगभूषणाय नमः भुजंगभूषण जो नागों को अपने आभूषण बनाते हैं।
64 ॐ भर्गाय नमः भर्ग जो अज्ञान और पापों को भस्म करने वाले हैं।
65 ॐ गिरिधन्विने नमः गिरिधन्वा जिन्होंने मेरु पर्वत को धनुष बनाया था।
66 ॐ गिरिप्रियाय नमः गिरिप्रिय जिन्हें पर्वत और प्रकृति प्रिय हैं।
67 ॐ कृत्तिवाससे नमः कृत्तिवासा जो गजचर्म और व्याघ्रचर्म धारण करते हैं।
68 ॐ पुरारातये नमः पुराराति जो त्रिपुर दैत्यों के शत्रु हैं।
69 ॐ भगवते नमः भगवान जो समस्त ऐश्वर्य और ज्ञान से संपन्न हैं।
70 ॐ प्रमथाधिपाय नमः प्रमथाधिप जो प्रमथगणों के स्वामी हैं।
71 ॐ मृत्युंजयाय नमः मृत्युंजय जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कराने वाले हैं।
72 ॐ सूक्ष्मतनवे नमः सूक्ष्मतनु जो सूक्ष्म रूप में कण-कण में विद्यमान हैं।
73 ॐ जगद्व्यापिने नमः जगद्व्यापी जो संपूर्ण संसार में व्याप्त हैं।
74 ॐ जगद्गुरवे नमः जगद्गुरु जो संपूर्ण जगत् के आदि गुरु हैं।
75 ॐ व्योमकेशाय नमः व्योमकेश जिनके केश आकाश की भाँति फैले हैं।
76 ॐ महासेनजनकाय नमः महासेनजनक जो कार्तिकेय (महासेन) के पिता हैं।
77 ॐ चारुविक्रमाय नमः चारुविक्रम जो सुंदर और पराक्रमी हैं।
78 ॐ रुद्राय नमः रुद्र जो दुःखों का निवारण करते हैं।
79 ॐ भूतपतये नमः भूतपति जो समस्त प्राणियों और भूतों के स्वामी हैं।
80 ॐ स्थाणवे नमः स्थाणु जो अविचल और स्थिर रहने वाले हैं।
81 ॐ अहिर्बुध्न्याय नमः अहिर्बुध्न्य जो कुंडलनी शक्ति और नागों के स्वामी हैं।
82 ॐ दिगम्बराय नमः दिगंबर जिनकी दिशाएँ ही वस्त्र हैं।
83 ॐ अष्टमूर्तये नमः अष्टमूर्ति जो प्रकृति के आठ तत्वों के रूप हैं।
84 ॐ अनेकात्मने नमः अनेकात्मा जो अनेक रूपों में प्रकट होते हैं।
85 ॐ सात्त्विकाय नमः सात्त्विक जो परम सत्व गुण संपन्न हैं।
86 ॐ शुद्धविग्रहाय नमः शुद्धविग्रह जिनका शरीर परम शुद्ध और दिव्य है।
87 ॐ शाश्वताय नमः शाश्वत जो सनातन और नित्य रहने वाले हैं।
88 ॐ खण्डपरशवे नमः खण्डपरशु जो शत्रुओं को खंडित करने वाला फरसा रखते हैं।
89 ॐ अजाय नमः अज जो अजन्मा और नित्य हैं।
90 ॐ पाशविमोचकाय नमः पाशविमोचक जो सांसारिक बंधनों (पाश) से मुक्त करते हैं।
91 ॐ मृडाय नमः मृड जो सुख और आनंद प्रदान करने वाले हैं।
92 ॐ पशुपतये नमः पशुपति जो अज्ञान रूपी जीवों (पशुओं) के स्वामी हैं।
93 ॐ देवाय नमः देव जो स्वयं प्रकाशमान और दिव्य हैं।
94 ॐ महादेवाय नमः महादेव जो देवों के देव सबसे महान हैं।
95 ॐ अव्ययाय नमः अव्यय जो कभी नष्ट नहीं होते, अविनाशी हैं।
96 ॐ प्रभवे नमः प्रभु जो सर्वसमर्थ और सर्वशक्तिमान हैं।
97 ॐ पूषदन्तभिदे नमः पूषदन्तभित् दक्ष यज्ञ में पूषा के दाँत तोड़ने वाले।
98 ॐ अव्यग्राय नमः अव्यग्र जो सदैव शांत और अविचल रहते हैं।
99 ॐ दक्षाध्वरहराय नमः दक्षध्वरहर राजा दक्ष के अहंकारी यज्ञ का संहार करने वाले।
100 ॐ हराय नमः हर जो साधकों के समस्त पापों को हर लेते हैं।
101 ॐ भगनेत्रभिदे नमः भगनेत्रभित् भग देवता के नेत्रों का छेदन करने वाले।
102 ॐ अव्यक्ताय नमः अव्यक्त जो चर्मचक्षुओं से अप्रकट और अति सूक्ष्म हैं।
103 ॐ सहस्त्राक्षाय नमः सहस्त्राक्ष जिनके हजारों नेत्र हैं (सर्वव्यापी)।
104 ॐ सहस्त्रपदे नमः सहस्रपाद जिनके हजारों पैर हैं।
105 ॐ अपवर्गप्रदाय नमः अपवर्गप्रद जो जीव को मोक्ष प्रदान करते हैं।
106 ॐ अनन्ताय नमः अनन्त जिनकी कोई सीमा या अंत नहीं है।
107 ॐ तारकाय नमः तारक जो संसार सागर से पार उतारने वाले हैं।
108 ॐ परमेश्वराय नमः परमेश्वर जो सर्वोपरि और परम सत्ता हैं।

5. पौराणिक पृष्ठभूमि एवं संदर्भ

स्कंद पुराण और शिव पुराण के अनुसार, इस स्तोत्र का इतिहास अत्यंत अलौकिक है। जब माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की, तब भगवान श्री हरि विष्णु ने उन्हें इस स्तोत्र के नियमित पाठ की सलाह दी थी। माता पार्वती ने एक वर्ष तक निरंतर तीनों काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में इन 108 दिव्य नामों का भक्तिपूर्वक जप किया। इस साधना के फलस्वरूप भगवान महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपने अर्धांग में स्थान देकर ‘अर्धनारीश्वर’ रूप स्वीकार किया।

सनातनी धर्मग्रंथों एवं पौराणिक शोध के प्रामाणिक अध्ययन के लिए आप
Gita Press Gorakhpur
तथा संस्कृत मूल पाठों के लिए
Wisdom Library Scriptures
का संदर्भ ले सकते हैं।


6. स्तोत्र पाठ और नाम-जप करने की शास्त्रीय विधि

  1. समय चयन: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (4:00 AM – 6:00 AM) अथवा संध्या समय (प्रदोष काल) इस स्तोत्र के पाठ के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
  2. आसन एवं स्वच्छता: स्नान के उपरांत शुद्ध वस्त्र धारण करें तथा कुशा या ऊन के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. पूजन सामग्री: शिवलिंग या शिवजी के चित्र के समक्ष देसी गाय के घी का दीपक जलाएं। महादेव को जल, कच्चा दूध, गंगाजल, चंदन और विशेष रूप से त्रिदल बिल्वपत्र अर्पित करें।
  4. ध्यान एवं संकल्प: हाथों में जल व अक्षत लेकर संकल्प करें और पहले शिवजी के ध्यान मंत्र का उच्चारण करें, फिर स्तोत्र का पाठ करें।

7. पाठ के अद्भुत आध्यात्मिक व व्यावहारिक लाभ

  • पापों का नाश: शतरुद्री के तीन बार पाठ करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह इस स्तोत्र के मात्र एक बार एकाग्रचित्त पाठ से मिल जाता है।
  • रोग एवं भय से मुक्ति: ‘मृत्युंजय’ और ‘कालकाल’ रूप का ध्यान साधक को अकाल मृत्यु और गंभीर बीमारियों से सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
  • ग्रह शांति: शनि ढैय्या, साढ़ेसाती या राहु की महादशा में इस स्तोत्र का पाठ ग्रह दोषों को शांत करता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: बिल्वपत्र या अक्षत से इन नामों द्वारा शिव पूजन करने वाला साधक जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

8. निष्कर्ष (Conclusion)

भगवान शिव का नाम-जप केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन को शांत और ऊर्जावान बनाने की एक गहन आध्यात्मिक विधि है। ‘शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्’ में संकलित 108 नाम शिव के विराट स्वरूप का बोध कराते हैं। दैनिक जीवन में श्रद्धापूर्वक इन नामों का पाठ या स्मरण करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और परम कल्याण की प्राप्ति होती है।

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