लाहरी महाशय और श्री राम ठाकुर | Lahri Mahashay Aur shri Ram Thakur | Neem Karoli Baba

नीम करोली बाबा के समकालीन संत लाहरी महाशय और श्री राम ठाकुर की कथा

एक बार लाहड़ी महासय के घर वाराणसी मे एक ब्राह्मण भक्त जो श्री लाहड़ी जी के भक्त थे जो लाहड़ी महासय पास में बैठे थे। वहां एक निम्न जाति का जल भरने का काम करने वाला व्यक्ति भी महाशय के पास आता था। जो आज महासय के सामने बैठ गया। ब्राह्मण जी को यह बात सही नही लगी और उन्होंने उसे डांटते हुए पीछे बैठने को कहा। 

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इस पर श्री लाहड़ी जी ने साधना से उठ कर अपना स्थान छोड़ कर ब्राह्मण जी को गुस्से से देखा। साथ ही उस निम्न जाति के व्यक्ति से कहा तुम हमारे स्थान पर बैठो। हम नीचे बैठ जायेंगे।

व्यक्ति ने सोचा कि लाहड़ी जी नाराज हो गए और वे मजाक में हमे ऐसा करने को कह रहे है। वह क्षमा मांगने लगा। किन्तु लाहड़ी जी ने उसे कहा हम चाहते है कि तुम्हे उच्च स्थान मिले। ताकि आगे से तुम्हारा कोई अपमान न करे। जाओ बैठो। सभी को लाहड़ी जी की बात समझ में आगई।
एक बार संत श्री राम ठाकुर के आश्रम में सत्संग चल रहा था । बाहर एक मुस्लिम प्रसाद लिए खड़ा था। श्री राम ठाकुर के एक भक्त ने उससे पूछा यहां क्या कर रहे हो।अंदर चलो वह बोला वह मुस्लिम है ठाकुर को प्रसाद भेंट करना चाहता है। आप यह बाबा तक पहुचा दें। ठाकुर जी के भक्त ने प्रसाद लिया और अंदर ले गए। जब वह दोनों अंदर गए तो ठाकुर जी ने बड़े प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया और उस मुस्लिम भक्त से सभी के सामने पूछा । तुम मेरे लिए इतने भाव से प्रसाद लाये हो। तुम्हारे ख्वाजा मौलवी क्या कहे गे वो डांटे गे। तो वह बोला खुदा सब जानते है, आप से भी कुछ छिपा नही। हमे किसी का डर नही। बस बात सिर्फ इतनी ही है की भक्ति सिर्फ सरल हृदय और भेद भाव रहित व्यक्ति ही कर सकता है। बाकी दिखावा तो हर एक व्यक्ति कर सकता है।

निष्कर्ष:

इन दोनों ही दिव्य घटनाओं से यह साबित होता है कि दिव्य विभूति या दिव्य संत कभी भी आमजन में भेदभाव नहीं करते। उनके लिए प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक साधक समान भाव का होता है और वह अपनी करुणा प्रत्येक प्राणी पर समान भाव से वितरित करते रहते हैं और सबका कल्याण करते हैं। 

जय गुरुदेव
जय श्री नीम करोली बाबा की 


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