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Vishnu Sahasranamam Stotram With Hindi Lyrics

Vishnu Sahasranamam Stotram Mahima ॐ  नमो भगवते वासुदेवाय नमः  प्रिय भक्तों विष्णु सहस्त्रनाम भगवान श्री हरि विष्णु अर्थात भगवान नारायण के 1000 नामों की वह श्रृंखला है जिसे जपने मात्र से मानव के समस्त दुख और कष्ट दूर हो जाते हैं और भगवान विष्णु की अगाध कृपा प्राप्त होती है।  विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करने में कोई ज्यादा नियम विधि नहीं है परंतु मन में श्रद्धा और विश्वास अटूट होना चाहिए। भगवान की पूजा करने का एक विधान है कि आपके पास पूजन की सामग्री हो या ना हो पर मन में अपने इष्ट के प्रति अगाध विश्वास और श्रद्धा अवश्य होनी चाहिए।  ठीक उसी प्रकार विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते समय आपके हृदय में भगवान श्री विष्णु अर्थात नारायण के प्रति पूर्ण प्रेम श्रद्धा विश्वास और समर्पण भाव का होना अति आवश्यक है। जिस प्रकार की मनो स्थिति में होकर आप विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करेंगे उसी मनो स्तिथि में भगवान विष्णु आपकी पूजा को स्वीकार करके आपके ऊपर अपनी कृपा प्रदान करेंगे।    भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों का पाठ करने की महिमा अगाध है। श्रीहरि भगवान विष्णु के 1000 नामों (Vishnu 1000 Names)के स्मरण मात्र से मनु

नीम करोली बाबा ने युधिष्ठिर को दिया प्राण दान - श्री कैंची धाम

नीम करोली बाबा ने युधिष्ठिर को दिया प्राण दान  - श्री कैंची धाम 
नीम करोली बाबा जी के भगत श्री ओंकार सिंह जी के पुत्र ,युधिष्ठिर सिंह के साथ बाबा नीम करोली उसी की गाड़ी में भूमियाधार आये थे। रात्रि विश्राम के बाद सुबह ब्रम्ह मुहूर्त के अंधेरे में ही युधिष्ठिर और उमादत्त शुक्ल मंदिर से बाहर आ गए कि अंधेरे-अंधेरे में ही शौचादि से निपट लें। कुछ दूर पर एक चट्टान पर से अपना कोट जैसे ही उठाना चाहा कि उन्हें एक काले नाग(कोबरा) ने डस लिया। युधिष्ठिर चिल्लाते हुए मंदिर की तरफ भागे कि," साँप ने काट लिया ", पर आधे मार्ग में ही अचेत होकर गिर पड़े । कुछ ही देर में उनका सारा शरीर विष के प्रभाव से काला पड़ गया और उन्हें अन्य लोग मंदिर के पास ले आये । वे सब प्रकार से मृत हो चुके थे।
नीम करोली बाबा

उधर नीम करोली बाबा चिल्लाते रहे कि ,"युधिष्ठिर मर गया है। इसके बाप को खबर भेज दो"। कुछ देर बाद उन्होनें बृहमचारी बाबा को डाँट लगाई कि ,"देखते क्या हो । इसे खूब तेज चाय पिलाओ"। ऐसा ही करने का प्रयास किया गया पर मृत(?) को कैसे पिलाई जाती चाय ? तब बाबा जी स्वयं आये ,युधिष्ठिर को डाँट कर कहा ," उठ चाय पी", और अपने हाथो से उसे उठाकर , बैठाकर चाय पिला दी। उसके बाद उसको आज्ञा दी कि," उठो गाड़ी पर बैठो । हमें रानीखेत ले जाओ ।" सभी आश्चर्य चकित हो यह तमाशा देखते रहे। बाबा जी स्वयं उसके बगल में बैठ गए और युधिष्ठिर गाड़ी चलाने लगे !!भवाली पार हो गई ।उधर बाबा जी और तेज, और तेज कहते रहे तथा जब भी युधिष्ठिर विष के नशे मे झूमने सोने लगते तभी महाराज जी उनको अपने  पाँवों की ठोकर से सचेत कर देते कहते हुए कि,"सोता क्यों है ?" कैंची भी निकल गई ,गरमपानी ,खैरना आदि पार हो गए इसी प्रकार ,और फिर पुल पार रानीखेत रोड़ पर गाड़ी दौड़ चली। रानीखेत पहुँचकर महाराज  जी ने हुक्म दिया कि, "वापिस चलो"।  बाबा लौटते वक़्त कुछ देर कैंची में रूके। वे उतर कर अन्यत्र चले गये। तब तक युधिष्ठिर यथेष्ट रूप से सचेत हो चुके थे। उन्हें भूख भी लग आई । तभी देखा कि गाड़ी की पिछली सीट पर ढेर सारे सेव रखे है!! भरपेट सेव खाये और फिर बाबा जी के आने पर पूर्ण चेतना में भूमियिधार लौट आये। विष का पूरा इलाज हो गया !!
एक सर्प दंश से मृत प्राय व्यक्ति द्वारा पहाड़ी सड़कों के उतार चढ़ाव एंव मोड़ो में गाड़ी चलाये जाने की कल्पना पाठक स्वयं कर सकते है।(ब्रह्मचारी बाबा के अनुसार इस घटना के बाद महाराज जी तीन दिन तक कुटी में बन्द रहे। श्री नीम करोली बाबा का पूरा शरीर तीन दिन तक कला बना रहा !!)
श्री नीम करोली महाराज की जय 
श्री कैंची धाम की जय 
अनन्त कथामृत

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