देवभूमि उत्तराखंड की पावन धारा पर नीम करोली बाबा जी महाराज के अनेक धाम स्थित हैं, जहाँ प्रतिदिन हज़ारों श्रद्धालु अलौकिक शांति और आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचते हैं। कैंची धाम (Kainchi Dham) के साथ-साथ भूमियाधार आश्रम भी बाबा जी की तपोस्थली और लीलाओं का प्रमुख केंद्र रहा है।
महाराज जी की दिव्य लीलाएँ केवल साधारण चमत्कार नहीं थीं, बल्कि वे अपने भक्तों के प्रति उनके असीम वात्सल्य और रक्षक स्वरूप का जीवंत प्रमाण थीं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और रोंगटे खड़े कर देने वाला प्रसंग भूमियाधार में घटित हुआ था, जहाँ काल के मुख में जा चुके एक भक्त को बाबा जी ने मौत के पंजों से खींचकर नया जीवन प्रदान किया।
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प्रातः काल का भयावह हादसा: भूमियाधार में सर्पदंश की घटना
यह घटना उस समय की है जब नीम करोली बाबा जी अपने एक अनन्य भक्त श्री ओंकार सिंह जी के पुत्र युधिष्ठिर सिंह के साथ उनकी ही गाड़ी में सवार होकर भूमियाधार आश्रम पहुँचे थे। आश्रम में रात्रि विश्राम के पश्चात् ब्रह्म मुहूर्त का समय था। चारों ओर पहाड़ों पर भोर का घना अंधेरा और हल्की शीतलता फैली हुई थी।
युधिष्ठिर सिंह और उनके साथी उमादत्त शुक्ल जी भोर के उसी धुंधलके में शौचादि से निवृत्त होने के लिए मंदिर परिसर से थोड़ा बाहर निकले। रास्ते में एक बड़ी सी चट्टान रखी हुई थी, जिस पर युधिष्ठिर जी का कोट रखा हुआ था। जैसे ही युधिष्ठिर ने उस चट्टान पर से अपना कोट उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, कोट के नीचे छिपे एक अत्यंत विषैले काले नाग (कोबरा) ने उन्हें फुंकार मारते हुए डस लिया।
विष का तीव्र प्रहार और अचेत अवस्था
साँप के डसते ही युधिष्ठिर जी के प्राण सूख गए। वे अपनी पूरी ताकत से चिल्लाते हुए मंदिर परिसर की ओर भागे— "साँप ने काट लिया! मुझे साँप ने काट लिया!"
परंतु, ज़हर इतना तीव्र और प्राणघातक था कि वे आधे रास्ते में ही गश्त खाकर ज़मीन पर गिर पड़े। कुछ ही पलों के भीतर विष उनके पूरे रक्तसंचार में फैल गया और उनका पूरा शरीर स्याह काला पड़ने लगा। जब आश्रम में मौजूद लोग भागे-भागे वहाँ पहुँचे और उन्हें उठाकर मंदिर के पास लाए, तब तक युधिष्ठिर की श्वास थम चुकी थी। उनकी नाड़ी बंद थी और वे पूरी तरह से मृतप्राय प्रतीत हो रहे थे।
"युधिष्ठिर मर गया है!" – बाबा जी का रहस्यमयी व्यवहार
जब आश्रम के सदस्य और भक्तगण भय और शोक में डूबे हुए थे, तब महाराज नीम करोली बाबा जी का व्यवहार सभी को अचंभित करने वाला था। वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे:
"युधिष्ठिर मर गया है! इसके बाप को तुरंत खबर भेज दो!"
आश्रम में मौजूद लोग बाबा जी के मुख से ये शब्द सुनकर और अधिक स्तब्ध रह गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि महाराज जी ऐसा क्यों कह रहे हैं। इसके बाद बाबा जी ने वहाँ खड़े ब्रह्मचारी बाबा की ओर देखा और डांटते हुए कहा— "देखते क्या हो? इसे खूब तेज और कड़क चाय पिलाओ!"
एक मृत शरीर को चाय कैसे पिलाई जाए?
वहाँ उपस्थित सभी लोग असमंजस में पड़ गए। जो व्यक्ति चेतना खो चुका हो, जिसकी श्वास और धड़कन बंद हो चुकी हो, उसे चाय कैसे पिलाई जा सकती है? प्रयास किया गया, लेकिन अचेत युधिष्ठिर के मुँह में चाय की एक घूँट भी नहीं जा पा रही थी।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए महाराज जी स्वयं आगे बढ़े। वे युधिष्ठिर के समीप पहुँचे, उन्हें एक पिता की डांट और अधिकार भरे स्वर में पुकारा— "उठ! चाय पी!"
महाराज जी ने अपने हाथों से मृतप्राय युधिष्ठिर को उठाया, सहारा देकर बैठाया और अपने हाथों से उन्हें चाय पिलाई। बाबा जी की वाणी में कौन सा अलौकिक सामर्थ्य था, यह तो केवल ईश्वर ही जान सकता है—चाय पीते ही युधिष्ठिर के अचेत शरीर में हल्की हलचल होने लगी।
पहाड़ी रास्तों पर मौत से जंग और चमत्कारी कार यात्रा
चाय पिलाने के तुरंत बाद बाबा जी ने युधिष्ठिर को आदेश दिया— "उठो, गाड़ी पर बैठो और हमें अभी रानीखेत ले जाओ!"
यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित सभी भक्त और ग्रामीण हक्के-बक्के रह गए। जो व्यक्ति कुछ देर पहले ज़हर के प्रभाव से मृत्यु की गोद में सो रहा था, उसे दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलाने का आदेश दिया जा रहा था। परंतु बाबा जी की आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी। बाबा जी स्वयं गाड़ी में आगे की सीट पर युधिष्ठिर के ठीक बगल में बैठ गए। युधिष्ठिर ने स्टेयरिंग सँभाला और गाड़ी भवाली की ओर दौड़ पड़ी।
बाबा जी की 'पाँव की ठोकर' और विष का असर
पहाड़ी सड़कों के तीखे मोड़, उतार-चढ़ाव और गहरी खाइयों के बीच गाड़ी चल रही थी। विष का असर पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ था। बीच-बीच में जब भी विष के नशे और खुमारी के कारण युधिष्ठिर की आँखें बंद होने लगतीं या वे झूमने लगते, तब बाबा जी अपने पाँव से उन्हें ठोकर मारते और डांटते हुए कहते— "सोता क्यों है? गाड़ी चला!"
बाबा जी की वह ठोकर कोई साधारण स्पर्श नहीं था, बल्कि वह युधिष्ठिर के भीतर चेतना का संचार करने वाला एक दिव्य प्रहार था। भवाली पार हुई, उसके बाद गाड़ी कैंची धाम के पावन मार्ग से गुजरी। गरमपानी और खैरना के पुलों को लाँघते हुए गाड़ी रानीखेत रोड पर हवा से बातें करने लगी।
रानीखेत से वापसी: सेवों का चमत्कार और पूर्ण स्वास्थ्य लाभ
रानीखेत पहुँचते ही महाराज जी ने अचानक हुक्म दिया— "अब वापस चलो!"
गाड़ी वापस भूमियाधार की ओर मुड़ गई। लौटते समय महाराज जी कुछ देर के लिए कैंची धाम में रुके और गाड़ी से उतरकर कहीं अन्यत्र चले गए। इस समय तक युधिष्ठिर पूरी तरह से होश में आ चुके थे। विष का प्रभाव समाप्त हो चुका था और शरीर में स्वाभाविक ऊर्जा लौट आई थी।
पूर्ण चेतना आते ही उन्हें ज़ोरों की भूख महसूस होने लगी। तभी उनकी नज़र गाड़ी की पिछली सीट पर पड़ी, जहाँ आश्चर्यजनक रूप से ढेर सारे ताज़ा सेव (Apples) रखे हुए थे। युधिष्ठिर ने भरपेट सेव खाए। जब बाबा जी वापस आए और वे पुनः भूमियाधार पहुँचे, तब तक युधिष्ठिर पूर्णतः स्वस्थ और नवजीवन से परिपूर्ण हो चुके थे। काले नाग के प्राणघातक विष का नामोनिशान भी उनके शरीर में बाकी नहीं रहा था।
विष का त्याग: बाबा जी का तीन दिनों का मौन और कुटी वास
इस सम्पूर्ण घटनाक्रम का सबसे गूढ़ और अलौकिक पहलू इसके बाद सामने आया। ब्रह्मचारी बाबा के संस्मरणों के अनुसार, भूमियाधार लौटने के बाद नीम करोली बाबा जी महाराज लगातार तीन दिनों तक अपनी कुटी में बंद रहे।
इन तीन दिनों के दौरान महाराज जी का पूरा शरीर स्याह काला पड़ गया था।
💡 आध्यात्मिक रहस्य:
सिद्ध पुरुष और अवतार जब किसी भक्त के ऊपर आए घोर संकट या मृत्यु को टालते हैं, तो वे प्रकृति के नियम का पालन करते हुए उस कष्ट या विष को स्वयं अपने शरीर पर धारण कर लेते हैं। बाबा जी ने युधिष्ठिर के शरीर से कालकूट विष को खींचकर स्वयं अपने भीतर समाहित कर लिया था और तीन दिनों की साधना के पश्चात् उस विष का शमन किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. नीम करोली बाबा का मुख्य आश्रम कहाँ स्थित है?
उत्तर: बाबा नीम करोली जी का सबसे प्रसिद्ध और मुख्य आश्रम श्री कैंची धाम (Kainchi Dham), नैनीताल (उत्तराखंड) में स्थित है। इसके अलावा भूमियाधार, वृंदावन और ऋषिकेश में भी बाबा जी के पावन आश्रम हैं।
Q2. भूमियाधार में युधिष्ठिर के साथ क्या घटना घटी थी?
उत्तर: भूमियाधार आश्रम में प्रभात काल के समय युधिष्ठिर सिंह को एक विषैले काले नाग ने डस लिया था, जिससे वे अचेत हो गए थे। बाबा नीम करोली जी ने उन्हें चाय पिलाकर और पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलवाकर जीवनदान दिया था।
Q3. नीम करोली बाबा जी ने युधिष्ठिर का विष कैसे दूर किया?
उत्तर: महाराज जी ने युधिष्ठिर से रानीखेत तक गाड़ी चलवाई और रास्ते भर अपने पाँव की ठोकर से उन्हें सचेत रखा। बाद में बाबा जी ने उस विष को स्वयं अपने शरीर पर ले लिया, जिसके कारण उनका शरीर तीन दिनों तक काला रहा।
निष्कर्ष: जय श्री नीम करोली महाराज
श्री नीम करोली बाबा जी की महिमा अपरंपार है। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण मानव कल्याण और भक्तों के उद्धार को समर्पित रहा। जो भी भक्त सच्चे हृदय से 'श्री कैंची धाम' की शरण में जाता है, महाराज जी उसकी समस्त बाधाओं और संकटों का निवारण अवश्य करते हैं।
श्री नीम करोली महाराज की जय!
श्री कैंची धाम की जय!
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