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​श्री हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ सहित | COMPLETE Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi

हनुमान चालीसा अर्थ सहित – मुख्य कवर इमेज
सनातन धर्म में हनुमान जी को भगवान शिव का 11 रुद्र अवतार माना जाता है। हनुमान जी की आराधना में हनुमान चालीसा का वैसा ही महत्व है जैसे श्री राम की आराधना में रामायण और रामचरितमानस का है। 

भारतवर्ष में जहां कहीं भी हनुमान जी की आराधना की जाती है, वहां हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है परंतु बहुत सारे लोगों को अभी तक हनुमान चालीसा का शाब्दिक अर्थ नहीं पता है। आज हम आपको हनुमान चालीसा का शुद्ध शाब्दिक अर्थ समझायेंगे जिसको जानने के पश्च्यात हनुमान चालीसा पढ़ने पर आप स्वयं को हनुमान जी के अति समीप महसूस करेंगे। 

हनुमान चालीसा सम्पूर्ण अर्थ सहित (Lyrics)

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
अर्थ - गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।
अर्थ- हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥
अर्थ - श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।
हनुमान चालीसा सम्पूर्ण अर्थ सहित (Lyrics)
राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥
अर्थ- हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।

महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥
अर्थ- हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।

कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥
अर्थ- आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।

हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥
अर्थ- आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।

शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥
अर्थ - हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।

विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥
अर्थ- आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥
अर्थ- आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥
अर्थ - आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।

भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥
अर्थ - आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।

लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥
अर्थ - आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥
अर्थ - श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥
अर्थ - श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥
अर्थ-श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥
अर्थ - यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥
अर्थ - आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥
अर्थ - आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥
अर्थ - जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥
अर्थ - आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।

दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥
अर्थ - संसार मे जितने भी कठिन से कठिन  काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।

राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥
अर्थ - श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥
अर्थ - जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।

आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥
अर्थ - आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।

भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥
अर्थ - जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।

नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥
अर्थ - वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।

संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥
अर्थ - हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥
अर्थ - तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।

और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥
अर्थ - जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥
अर्थ - चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।

साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥
अर्थ - हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
अर्थ - आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।
(1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।
(2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।
(3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।
(4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।
(5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।
(6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।
(7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।
(8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥
अर्थ - आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।

तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥
अर्थ - आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।

अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥
अर्थ - अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।

और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥
अर्थ - हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।

संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥
अर्थ - हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।

जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥
अर्थ - हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।

जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥
अर्थ - जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥
अर्थ - भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।

तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥
अर्थ - हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ - हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।

हनुमान चालीसा का इतिहास: किसने और कहाँ की इसकी रचना?हनुमान चालीसा के चमत्कारी लाभ

हनुमान चालीसा का इतिहास – किसने और कहाँ लिखा
​श्री हनुमान चालीसा मात्र एक काव्य नहीं, बल्कि भक्ति और अटूट विश्वास का वो माध्यम है जो हर भक्त को संकटमोचन के करीब लाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिव्य चालीसा की रचना कब, कहाँ और किन परिस्थितियों में हुई थी?

गोस्वामी तुलसीदास जी और मुगल शासक अकबर की कहानी

​मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की रचना की थी। उस समय भारत पर मुगल सम्राट अकबर का शासन था। तुलसीदास जी की ख्याति और उनके चमत्कारों की चर्चा जब अकबर के दरबार तक पहुँची, तो अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया।

​दरबार में अकबर ने तुलसीदास जी से कोई चमत्कार दिखाने को कहा। इस पर परम रामभक्त तुलसीदास जी ने विनम्रता से कहा, "मैं तो एक साधारण इंसान हूँ, कोई जादूगर नहीं। मेरे पास कोई चमत्कार नहीं है, जो कुछ भी है, वो सिर्फ मेरे प्रभु श्री राम की कृपा है।"

ग्वालियर के किले (जेल) में रचना

तुलसीदास, अकबर और चमत्कार की कथा
​तुलसीदास जी के इस उत्तर से क्रोधित होकर अकबर ने उन्हें ग्वालियर के किले की कालकोठरी (जेल) में बंदी बना लिया। जेल के उसी अंधियारे कमरे में, तुलसीदास जी ने विचलित हुए बिना संकटमोचन हनुमान जी का ध्यान शुरू किया। वहीं उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में 40 चौपाइयों वाले 'हनुमान चालीसा' की रचना की।

चमत्कार: जैसे ही तुलसीदास जी ने चालीसा का पाठ पूर्ण किया, वैसे ही अचानक लाखों बंदरों ने एक साथ अकबर के महल और पूरी सेना पर हमला बोल दिया। चारों तरफ हाहाकार मच गया। मंत्रियों की सलाह और बंदरों के आतंक को देखकर अकबर को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने तुरंत तुलसीदास जी को ससम्मान जेल से रिहा किया। रिहा होते ही बंदरों का उत्पात भी शांत हो गया।

हनुमान चालीसा पढ़ने के नियम और सही विधि (Rules)
हनुमान चालीसा पढ़ने के नियम और सही विधि

​हनुमान जी कलियुग के जाग्रत देवता हैं। वैसे तो प्रभु की भक्ति के लिए केवल सच्चे मन की आवश्यकता होती है, लेकिन यदि नियमबद्ध होकर हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए, तो इसका फल कई गुना बढ़ जाता है।

  • सही समय (When to Read): हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए सुबह (ब्रह्म मुहूर्त) और शाम (संध्याकाल) का समय सबसे उत्तम माना जाता है। सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके पाठ करें। यदि रात में सोने से पहले इसका पाठ किया जाए, तो बुरे सपनों से मुक्ति मिलती है।
  • विशेष दिन (Special Days): वैसे तो इसका पाठ प्रतिदिन करना चाहिए, लेकिन मंगलवार और शनिवार का दिन हनुमान जी को अत्यंत प्रिय है। इन दिनों में कम से कम 1, 7 या 11 बार पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
  • बैठने की सही दिशा (Right Direction): पाठ करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • आसन और शुचिता: कभी भी जमीन पर सीधे बैठकर पाठ न करें। कुशा या ऊन के साफ आसन का प्रयोग करें। पाठ के दौरान मन में शुद्ध विचार रखें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।

हनुमान चालीसा के चमत्कारी लाभ (Benefits)

​"संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा" — हनुमान चालीसा की यह चौपाई स्वयं में सिद्ध है। नियमित रूप से इसका पाठ करने वाले भक्तों को जीवन में निम्नलिखित जादुई बदलाव महसूस होते हैं:

हनुमान चालीसा के चमत्कारी लाभ

  • मानसिक भय और नकारात्मकता से मुक्ति: यदि आपको अज्ञात भय, डिप्रेशन या बुरे विचार परेशान करते हैं, तो हनुमान चालीसा का पाठ आपके भीतर अदम्य साहस का संचार करता है। "भूत पिशाच निकट नहिं आवै" के प्रभाव से हर तरह की नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है।
  • एकाग्रता और बुद्धि का विकास: विद्यार्थियों और कामकाजी लोगों के लिए यह रामबाण है। यह मन को शांत कर फोकस (Concentration) बढ़ाती है। इसके पाठ से हनुमान जी "बल बुद्धि विद्या" का वरदान देते हैं।
  • शनि दोष और ग्रहों की शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जो भक्त नियमित हनुमान चालीसा पढ़ते हैं, उन्हें शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान कष्ट नहीं झेलने पड़ते। हनुमान जी के भक्तों को शनि देव कभी परेशान नहीं करते।
  • असाध्य रोगों और संकटों का नाश: "नासै रोग हरै सब पीरा" के अनुसार, गंभीर और पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को नियमित पाठ से स्वास्थ्य लाभ मिलता है। जीवन में आने वाले बड़े से बड़े संकट और दुर्घटनाएं टल जाती हैं।
#हनुमान_चालीसा_हिंदी 

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